महाराज कामेश्वर सिंह की 118वीं जयंती कंबल वितरण व स्मृति व्याख्यान

महाराज कामेश्वर सिंह की 118वीं जयंती कंबल वितरण व स्मृति व्याख्यान
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  • रामबाग, कल्याणी निवास में कार्यक्रम
  • 500 जरूरतमंदों को कंबल वितरित
  • प्रो. देवारायण झा ने मुख्य व्याख्यान दिया
  • “इंडिया माइग्रेशन माउंटेंस एंड मोरालिटी” पुस्तक लोकार्पित

RxTv भारत , ब्यूरो दरभंगा –– दरभंगा के रामबाग स्थित कल्याणी निवास में महाराज धीराज कामेश्वर सिंह की 118वीं जयंती के अवसर पर भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे और जरूरतमंदों के बीच 500 कंबल का वितरण किया गया।

इस अवसर पर आयोजित कामेश्वर सिंह स्मृति व्याख्यान में प्रो. देवारायण झा (पूर्व कुलपति, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय) ने मुख्य वक्तव्य दिया।

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वक्ता ने कहा कि महाराज कामेश्वर सिंह उदारवीर थे और देशभर में शिक्षा तथा विद्या-विस्तार में उनका योगदान अतुलनीय रहा।
उन्होंने बताया कि मिथिला में 18 प्रकार की विद्या-परंपराएँ विकसित हुईं और मिथिला का ज्ञान-क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान रहा।

व्याख्यान के दौरान दर्शन, वेदांग, साहित्य, ज्योतिष, शिक्षा और मिथिला की बौद्धिक धरोहर पर विस्तृत चर्चा हुई। जयंती अवसर पर पाँचवाँ फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक “इंडिया माइग्रेशन माउंटेंस AND मोरालITY” का लोकार्पण किया गया, जिसमें पुस्तक संपादक प्रो. पंडित रामचंद्र झा तथा फाउंडेशन की ट्रस्टी प्रो. श्री चौधरी सहित कई विषय-विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

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वक्ताओं ने महाराज के शिक्षा और समाज सेवा के योगदान को याद करते हुए बताया कि उन्होंने देशभर के कई विश्वविद्यालयों को दान दिया — जिनमें कोलकाता विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय, बीएचयू और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय शामिल हैं।

बताया गया कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय राष्ट्रीय परिस्थिति कठिन थी, तब महाराज ने 15 मन सोना राष्ट्र को दान किया था। उद्योग क्षेत्र में कई फैक्ट्रियाँ व चीनी मिलें भी उनकी पहल से स्थापित हुईं।

चिकित्सा एवं सार्वजनिक संस्थागत योगदान के उदाहराण के रूप में वक्ताओं ने दरभंगा मेडिकल कॉलेज-अस्पताल (DMCH), दरभंगा हवाई अड्डा और अशोक पेपर मिल का उल्लेख किया।
डॉ. शीला साहू (अधीक्षक, DMCH) ने कहा कि 1925 में DMCH की स्थापना के लिए महाराज ने 4 लाख रुपये और 300 एकड़ भूमि दान में दी थी, जो आज भी मिथिला की महत्वपूर्ण विरासत मानी जाती है।

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कार्यक्रम के समापन में वक्ताओं ने शिक्षा, खेलकूद और कला-संस्कृति को समाज विकास के तीन मुख्य स्तम्भ बताते हुए महाराज के आदर्शों को आगे बढ़ाने और उन्हें भारत रत्न दिलाने के जन आंदोलन को मजबूत करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन फाउंडेशन के ट्रस्टी डॉ. रामचंद्र झा ने किया।

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